उत्तर प्रदेश के गोण्डा जिले के रायपुर गांव में, 1984 की 8 मार्च को किसान परिवार में जन्म हुआ। पिताजी वंशराज मौर्य जहां भी जाते विपरीत जलवायु में होने वाले विभिन्न किस्म के पौध और बीज ले आते। इन्हें उन्होंने सफलता से रोपा। पिताजी ने कृषि संस्कारों से बचपन गढ़ा। कहते थे- खूब पढ़ो पर गुणो भी। एम.कॉम. करते हुए मशरूम का प्रशिक्षण लिया। मशरूम के काम में जुटा, बिकी नहीं। मधुमक्खीपालन में भी हर कोई मजाक उड़ाने लगा। मधुमक्खियां जो उड़ गईं। छोटी मोटी नौकरी भी नहीं मिली। उधर, कुसुम से शादी हो गई। दोनों की नौकरी लगी। कुछ अवधि बाद ये भी नहीं रही। पत्नी और बच्चों देवेन्द्र एवं चन्द्रगुप्त का पेट भरना कठिन हो गया। उजास की किरणें दिखीं 2014 में। स्कूल में निवेश मेले में बताया गया कि बैंक कृषक समूहों को फार्म मशीनें देगा। इसमें कुछ सफलता मिली।
अनुभव की पाठशाला
पिताजी की सीख को अपनाया कि जहां भी कृषि में कुछ नया सुनो या देखो, जानकारी लो, समझो और करो। इसके लिए प्रशिक्षण लिए, जगह-जगह गया। हरियाणा के किसान वैज्ञानिक धर्मबीर कम्बोज के नवाचारों को दो बार देखा। कोलकाता गया। ठान लिया कि कृषि को उद्योग के रूप में अपनाना है। कृषि उत्पादन, मूल्य संवर्धन और उसकी बिक्री विविध तरीकों से खुद करेंगे। राजस्थान में डॉ. महेन्द्र मधुप ने किसान वैज्ञानिकों से मिलवा कर जिन्दगी की दिशा ही बदल दी।
गुर आय बढ़ाने का
पिताजी ने 1980 से एक एकड़ में विपरीत जलवायु में पैदा होने वाले ढाई सौ से अधिक किस्मों के पौधे लगाए। ये आय के स्रोत हैं। इस नवाचार को आगे बढ़ाया। अपनी चार एकड़ कृषि भूमि पर विभिन्न स्थानों से अनेक किस्मों के पौध और बीज लाकर या मंगवा कर उन्हें लगाने की प्रक्रिया निरन्तर है। इनसे विभिन्न उत्पाद और दवाइयां बनाता हूं। इनसे अच्छा मुनाफा हो रहा है। पिताजी औषधीय फसलों और अन्य फसलों से दवाइयां बनाकर लोगों को रोगमुक्त करते थे। पिछले वर्ष 17 जुलाई को उनके देहमुक्त होने पर संकल्प लिया कि पिताजी की तरह उन लोगों का मुफ्त इलाज करूंगा जो आर्थिक तंगी के कारण दवाई खरीदने में असमर्थ हैं। कृषि नवाचारों और मिनखपन के सफर में, संयुक्त परिवार के सभी सदस्यों का भरपूर सहयोग और प्रोत्साहन मिला।
हमारी सब्जी, फल और औषधीय फसलें देखने और उनके उत्पाद लेने दूर-दूर से लोग आते हैं। वे समझते हैं कि इनके मूल्य संवर्धन से हमारी आय में कई गुना बढ़ोतरी कैसे हुई। एलोवेरा का दवाइयों में भरपूर उपयोग होता है। इसके लड्डू भी बनाते हैं। सहजन का अचार, उसके फलों का तेल और पत्तियों का पाउडर। तुलसी से अर्क, काढा और पाउडर। वे चुकन्दर जरूर देखते हैं, जिनका वजन चार गुना हो गया। गुलाब से बनने वाले गुलाबजल की बहुत मांग है।
पपीते की खेती 45 वर्षों से हो रही है। पेड़ पर फल समाप्त होने पर, इसके नीचे के भाग का जूस निकालते हैं। हमारे यहां अम्लवेल नीबू भी है। इसके और पपीते के जूस को मिला कर पथरी की दवाई बनाते हैं।
परवल की नई प्रजाति
परवल की फसल में दशपर्णी का अर्क और घोल डालने से, फल देसी परवल से बेहतर होते हैं। उत्साहित होकर तीन प्रकार के परवल लगाए। परवल की नई प्रजाति स्वतः बन गई।
यूट्यूब चैनल
हमारे खेत पर चाह कर भी जो किसान नहीं आ पाते, उनके लिए सोशल मीडिया के जरिए सूचनाओं का आदान प्रदान करते हैं। हमारा यूट्यूब चैनल ‘क्रेजी फार्मर’ बड़ी संख्या में किसान भाई देखते हैं।
घाटा नहीं
यदि किसान साथी कृषि उत्पादन को समझदारी से कृषि उद्योग में ढाल लें तो कभी घाटा नहीं होगा। विविध फसलें लें और उपज को मूल रूप में न बेच, उनके उत्पाद बनाकर अपने तरीके से बेचें तो लाभ ही लाभ है। दुनिया भर के औषध बाजार में औषधीय उत्पादों की भारी मांग है। कृषि उपजों के विविध उत्पाद बनाकर, बाजार शक्तियां किसान की तुलना में कईं गुना मुनाफा कमाती हैं। किसान ठान ले तो यह मुनाफा उसके पाले में भी आ सकता है।
सम्मान और सम्पर्क
2017 : गोण्डा में जनपद स्तर पर टमाटर उत्पादन के लिए प्रथम पुरस्कार
2020 : गोण्डा में आयुक्त, देवीपाटन मण्डल द्वारा प्रशस्तिपत्र
2021: लुम्बनी, नेपाल में अन्तरराष्ट्रीय पर्यावरण योद्धा सम्मान (तुलसी)
सम्पर्क कर सकते हैं
शिवकुमार मौर्य, ग्राम रायपुर, विकासखण्ड वजीरगंज, जनपद गोण्डा-271129 (उत्तर प्रदेश) मोबाइल : 9554902715